बालकों के सशक्तिकरण के लिए भारतीय संविधान में कानून

प्रस्तावना :-             
               
यह सर्वविदित है कि सामान्यता बालक, अपनी सामाजिक, मानसिक, शारीरिक, भौतिक – आर्थिक अक्षमता के कारण ही शोषण का विरोध करने मे असमर्थ होते है। उनमें अपनी रक्षा करने की योग्यता का अभाव होता है। यह एक ऐसी समस्या है जिसका उत्तर शक्तिप्रदत्तीकरण द्वारा ही हो सकता है। तात्पर्य है कि यदि शोषित बच्चों को शक्ति और योग्यता उपलब्ध करा दी जाये तो उनकी सामाजिक दशा मे सुधार तथा परिवर्तन की संभाव्यता बढ़ जायेगी ।इस उद्देश्य के लिए ऐसी नीतियो तथा विधियो के निर्माण एवं प्रवर्तन की आवश्यकता है जो वच्चों की शक्ति मे वृद्धि कर सके ।
    संविधान का अनुच्छेद 15, अन्य बातों के साथ, राज्यो को बालको के लिए विशेष उपवन्ध करने की शक्तियाँ प्रदान करता है । इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 19, अन्य बातो के साथ, यह उपबन्ध करता है कि राज्य अपनी नीति का, विशिष्टता इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से बालको की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो सके और बालको और अल्पवय व्यक्तियो की शोषण से रक्षा की जाये आैर उनको स्वतन्त्र और गरिमामय वातावरण मे स्वस्थ विकास के अवसर आैर सुविधाए दी जाए ।
उच्चतम न्यायालय ने भी स्पष्ट किया है कि भारतीय संविधान के अन्तर्गत यद्यपि मूल स्वातंत्राओ को सुनिश्चित किया गया है फिर भी राज्य की यह भूमिका है कि वह सुनिश्चित करे कि एक वर्ग दूसरे के मूल्य पर न बढे और कोई व्यक्ति सामाजिक कमरजोरियो के कारण पीछे न रह जाये। भारतीय समाज मे बालको की स्थिति शोषित की ही है, अतएव उपरोक्त सशक्तीकरण अपनाते हुऐ, बालको की स्थिति को सुधारने के लिए बहुत से अधिनियम पारित किये है जिनमे से कुछ महत्वपूर्ण नियमो की चर्चा की जा रही है ।
(1)-  बाल विवाह अवरोध अधिनियम, 1929 (Child Marriage Restraint Act, 1929)
    अधिनियम की घारा 3 के अनुसार यदि कोई पुरुष जिसकी आयु 18 बर्ष से अधिक और 21 बर्ष से कम हो, 15 वर्ष से कम आयु की लड़की से विवाह करता है, तो उसको हिन्दू विवाह अघिनियम, 1955 मे दिये गये साधारण कारावास एवं अर्थदण्ड (Fine) से दण्डित किया जायेगा । यानि कि उसे हिन्दू विवाह अधिनियम की घारा 18 के अन्तर्गत 15 दिन का साधारण कारावास या रु० 1000/- तक के अर्थदण्ड या दोनों से दण्डित किया जायेगा ।
        यदि कोई पुरूष जिसकी आयु 21 वर्ष से अधिक हो, 15 वर्ष से कम आयु की लडकी से विवाह करता है तो उसे 3 वर्ष तक के साधारण कारावास एवं अर्थदण्ड से दण्डित किया जायेगा ।
    घारा 5 के अनुसार जो बाल विवाह रचायेगा (Perform करेगा ) उसे भी समान दण्ड से दण्डित किया जायेगा ।
    घारा 6 के अनुसार कोई अवयस्क बाल विवाह करता है तो जिसके नियंत्रण मे रहते हुए वह अवयस्क विवाह करता है उसे 3 माह तक के कारावास तथा अर्थदण्ड से दण्डित किया जायेगा । लेकिन स्त्री को दण्डित नही किया जायेगा जब तक कि अन्यथा सिद्ध न हो जाये, यही माना जायेगा कि उस व्यक्ति ने बाल विवाह रोकने मे असावधानी बरती है जिसके नियंत्रण मे रहते हुए अवयस्क ने वाल विवाह किया है ।
    धारा 9 के अनुसार यदि बाल विवाह किये हुए 1 वर्ष से अधिक समय व्यतीत हो चुका है तो ऐसे मामलों मे कोई कार्यवाही नही होगी ।
 
बालक श्रम (प्रतिषेध स्वं विनियमन) अधिनियम, 1986 (Child Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986)-
    बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 की धारा 22(1) के द्वारा बालक नियोजन अधिनियम, 1938 (Employment of Children Act,1938) का निरसन (Repeal) कर दिया गया है। अधिनियम का मुख्य उदेश्य कम आयु के बच्चो को असुरक्षित एवं हानिकारक उद्योगों मे नियोजित करने से रोकना है तथा उनके कार्यों की दशाओं को विनियमित करना है ।
    अधिनियम की घारा 2 के अनुसार बालक उसे माना गया है जिसने अपनी आयु के 14 वर्ष पूरे नही किये हो। इस अधिनियम के उद्देश्य के लिए स्थापन (Establishment) शब्द मे दुकान (Shop), फार्म (Farm), आवासीय होटल, रेस्टोरेंट, भोजनालय (Eating House), नाट्यगृह (Theater) या जनता के आमोद (Amusement) या मनोरंजन (Entertainment) के लिए दूसरे स्थान सम्मिलित है। कर्मशाला (Workshop) शब्द से तात्पर्य ऐसे किसी परिसर से है जिसमे कोई औद्योगिक प्रकिया (Industrial Process) चल रही हो लेकिन इसमे कोई परिसर जिस पर कारखाना अधिनियम (Factory Act) की घारा 67 के उपवन्ध लागू होते हो, सम्मिलित नही है। इस अधिनियम के उपबन्धो को 1938 के निरसित अधिनियम का संशोधन समझा जा सकता है।
    अधिनियम की घारा 3 के द्वारा अनुसूची के भाग ए मे उल्लिखित किसी उपजीविका (Occupation) मे कार्य करने के लिए बालको का नियोजन प्रतिषेध किया गया है। किसी कर्मशाला मे जिसमे अनुसूची के भाग बी में उल्लिखित कोई प्रक्रिया चल रही हो, बालको के नियोजन पर घारा 3 के अन्तर्गत प्रतिषेध है। लेकिन ऐसी कर्मशालाओ मे, जहाँ ऐसी प्रक्रिया अधिभोगी द्वारा अपने परिवार की सहायता से चल रही हो या सरकार द्वारा स्थापित या सरकार द्वारा मान्यता या सहायता प्राप्त किसी स्कूल मे बालको को नियोजित किया जा सकता है। अधिनियम की घारा 4 के अन्तर्गत केन्द्र सरकार को अनुसूची संशोधित करने हेतू शक्ति प्रदान की गयी है।
अनुसूची ए में मुख्य रूप से निम्नलिखित उपजीविकाये है जिनमे बालकों के नियोजन पर प्रतिषेध है :
(1) रेल यात्रा, सामान एवं डाक का परिवहन,
(2) राख उठाना, राख के गढढे साफ करना या रेलवे परिसर मे निर्माण कार्य करना ,
(3) रेलवे स्टेशन पर भोजनालयों में काम करना तथा बार – बार ट्रेन मे उतरते – चढ़ने वाला कार्य करना,
(4) रेलवे स्टेशन, रेल की पटरियों तथा उनके निकट कोई निर्माण कार्य करना,
(5) बन्दरगाह पर कार्य करना,
(6) पटाखो, आतिशबाजी आदि के उत्पादन, विक्रय आदि का कार्य करना आदि ।
    अनुसूची का भाग बी उन प्रक्रियाओं का उल्लेख करता है जहाँ बालकों के नियोजन पर प्रतिषेध है। जिनमे ये प्रक्रियाये मुख्य है –
  (1) बीड़ी बनाना,
(2) कालीन बनाना,
(3) सीमेन्ट निर्माण,
(4) कपडो की रंगाई, सुखाई, बुनाई आदि,
(5) माचिस, विस्फोटक तथा पटाखो का निर्माण,
(6) साबुन निर्माण,
(7) ऊन की सफाई,
(8) भवन एवं निर्माण उद्योग,
(9) स्लेट – पेंसिल निर्माण,
(10) विषैले घातु से सम्बधिंत निर्माण प्रक्रिया आदि।
अधिनियम की घारा 7 के अनुसार सायं 7.00 बजे से सुबह 8.00 बजे तक तथा कार्य के निर्धारित समय के अतिरिक्त बालक को कार्य करने की न तो अनुमति दी जायेगी और न अपेक्षा की जायेगी । उसके कार्य करने का समय लगातार 3 घण्टे से अधिक नही होगा उसके वाद कम से कम एक घण्टे का बिश्राम करने का समय होना चाहिए। उसके कार्य करने का कुल समय, विराम अन्तराल तथा कार्य की प्रतीक्षा में लगे हुए समय को सम्मिलित करते हुए छः घण्टे प्रतिदिन से अधिक नही होना चाहिए। उसे किसी भी डिव दो स्थापनों मे न तो कार्य करने की अनुमति दी जायेगी और न ही अपेक्षा की जायेगी।
    अधिनियम की घारा 8 के अनुसार प्रत्येक बाल श्रमिक को सप्ताह में पूरे एक दिन का अवकाश मिलेगा जो कि अधिभोगी द्बारा निर्धारित किया जायेगा तथा इसमे तीन मास मे एक बार से अधिक परिवर्तन नही किया जायेगा । घारा 11 के अनुसार बाल श्रमिक का पूर्ण विवरण रखने हेतू एक रजिस्टर रखा जायेगा। जिसमें बाल श्रमिक का नाम, जन्म तिथि, कार्य के घण्टे, कार्य की प्रकृति, या अन्य निर्धारण विवरण अंकित किया जायेगा ।
    घारा 13 के अनुसार समुचित सरकार को बालको के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के लिए अधिनियम के अधीन नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है।
    घारा 5 के अनुसार अनुसूची में अन्य उपजीविकाये (Occupation) तथा प्रक्रियाये जोड़ने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार को सलाह देने हेतू केन्द्र सरकार बालश्रम तकनीकी समिति (Child Labour Technical Advisory Committee) का गठन करने के लिए प्राधिकृत है ।
    घारा 9 के अनुसार यदि नियोजक किसी बालक को नियोजित करता है तो नियोजन की तिथि से तीस दिन के अन्दर निरीक्षण को सूचित करने के लिए वाध्य है।

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